विंश काण्ड — कुन्ताप सूक्त
अथर्ववेद के अंतिम काण्ड में कुन्ताप सूक्त हैं — जिनमें ऋग्वेद के कुछ सूक्त भी संकलित हैं। इस काण्ड में सोम और अन्य देवताओं की स्तुतियाँ हैं।
Kanda 20 · Verse 1
आ याहि सुसुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम् । एदं बर्हिः सदो मम ॥ १ ॥
Ā yāhi suṣumā hi ta indra somam pibā imam. Edam barhiḥ sado mama.
हे इन्द्र, तुम इस सोम को पीने के लिए आओ, यह मेरा आसन और बर्हि (कुश) तुम्हारे स्वागत के लिए बिछा है। आओ, हे सुसुमा, मेरे इस आसन पर विराजमान हो।
Kanda 20 · Verse 1
अयमृ त्वा विचक्षणे जनीरिविभि संवृतः । प्र सोम इन्द्र सार्पतु ॥ १ ॥
O lord of cosmic vision, let this soma distilled and seasoned radiate to you from sense to the spirit, inspiring, soothing and beautifying like a bride on top of her beauty and virgin grace.
यह श्लोक कहता है कि हे इंद्र, जैसे ज्ञानी पुरुष अपनी पत्नी के साथ मिलकर किसी कार्य को करते हैं, उसी प्रकार तुम भी सोम रस का पान करो। यह सोम रस तुम्हारे लिए ही है और तुम इसका आनंद लो।
Kanda 20 · Verse 1
इन्द्र त्वं वृषभं वयं सुते सोमै हवामहे । स पाहि मघ्वो अन्धसः ॥ १ ॥
Indra tvā vṛṣabhaṁ vayaṁ sute some havāmahe. Sa pāhi madhvo andhasaḥ.
हे इन्द्र, हम सोम रस के द्वारा तुम्हें पुकारते हैं। हे धनवान इन्द्र, तुम इस सोम रस का पान करो।
Kanda 20 · Verse 1
उदु त्वे मधुमत्तमा गिर् स्तोमांस ईरते । सत्राजितो धनसा अक्षीततोयो वाजयन्तो रथांइव ॥ १ ॥
The sweetest of honeyed songs of praise and vibrations of homage rise to you flying like victorious, unviolated and invincible chariots laden with gold heading for higher destinations.
हे स्तुति करने वाले! जैसे रथ युद्ध में आगे बढ़ते हैं, वैसे ही मधुर वाणी से युक्त स्तोत्र, धन और विजय की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए कल्याणकारी होते हैं।
Kanda 20 · Verse 1
Acchā ma indraṁ matayaḥ svarvidaḥ sadhrī- cirviśvā uśatīranuṣata. Pari śvajante janayo yathā patim maryam na śundhyum maghavānamūtaye.
All my thoughts, words and actions, all together in perfect unison concentrated on the love and light of divinity, ecstatically adore and celebrate Indra, Lord
हे इंद्र, सत्य को जानने वाली बुद्धिमान स्त्रियाँ तुम्हारी स्तुति करती हैं, जैसे पत्नियाँ अपने प्रिय पति की सेवा करती हैं, वैसे ही वे तुम्हें प्रसन्न करने के लिए गाती हैं।
Kanda 20 · Verse 1
Śuṣmintamam na ūtave dyumnināṁ pāhi jāgrvim. Indra somaḿ śatakrato॥ १॥
Indra, lord ruler of the world, protector of life
हे इंद्र, तुम जागते हुए, बलवानों की रक्षा करो और सोम रस का पान करो।
Kanda 20 · Verse 1
यदिन्द्राहं यथा त्वमीशीय वस्तु एक इत् । स्तोता मे गोषखा स्यात्॥ १ ॥
Yadindrähäṁ yathā tvamīśīya vasva eka it. Stotā me goṣakhā syāt.
हे इंद्र, यदि मैं आपकी तरह सामर्थ्यवान हो जाऊं, तो मेरा स्तुतिकर्ता मेरा रक्षक और मित्र बने।
Kanda 20 · Verse 1
Tā vajriṇaṁ mandināṁ stomyaṁ mada indram rathe vahato haryatā hari. Purūṇyasmai savanāni haryata indrāya somā harayo dadhanvire.
Those adorable carriers, centrifugal and centripetal forces of divine nature, bear and sustain the power and presence of the thunder armed, joyous, adorable Indra in the divine blissful chariot, the universe of existence. For this Indra, blissful lord, many yajna sessions, soma oblations and beautiful gifts of homage are prepared and offered.
हे इंद्र, वज्र धारण करने वाले, स्तुति योग्य, मद से युक्त, रथ पर सवार होकर, हे हरि (सूर्य), इन स्तुतियों को ले चलो। ये हव्य (सोम रस) इंद्र के लिए तैयार किए गए हैं, जो उन्हें प्रसन्न करते हैं।
Kanda 20 · Verse 1
आ रोदसीं हर्यमाणो महिम्वा नव्यंनव्यं हर्यसि मन्म नृ प्रियम् । प्र पुस्य मसुर् हर्यतं गोराविष्कृधि हरये सूर्य्याय ॥ १ ॥
Lord of love and beauty, loved and loving all,
हे सूर्य देव, अपनी अपार महिमा से, आप प्रकाशमान हैं और नित्य नवीन स्तुतियों के योग्य हैं। आप सभी को प्रिय हैं, अपनी शक्ति से हमें धन-धान्य और ज्ञान प्रदान करें।
Kanda 20 · Verse 1
Ā rodasiṁ haryamāṇo mahitvā navyaṁnavyaṁ haryasi manma nu priyam. Pra pastyamasura haryataṁ gorāviṣkr̥dhi haraye sūryāya.
Lord of love and beauty, loved and loving all,
हे सूर्य देव, अपनी अपार महिमा से आप आकाश और पृथ्वी को आनंदित करते हैं, और नित्य नवीन रूप धारण करते हैं। हे असुरों के रक्षक, अपनी महिमा को प्रकट करें, जिससे हम आपकी स्तुति कर सकें।
Kanda 20 · Verse 1
प्रणेतारं वस्यो अच्छा कर्ता रं ज्योतिः समत्सु । सासह्रांसं युधामित्रा न् ॥ १ ॥
हे मित्र, जो युद्ध में शत्रुओं को पराजित करने वाले, प्रकाश स्वरूप और महान शक्ति वाले हैं, वे ही श्रेष्ठ कर्म करने वाले हैं।
Kanda 20 · Verse 1
अभि त्वा वर्चसां गिरः सिञ्चन्तीराचर्षणयः । अभि वत्स न धेनवः ॥ १ ॥
May the flowing waters, like cows to their calves, pour forth their brilliance upon you.
हे भगवन, जैसे गायें अपने बछड़ों को दूध पिलाती हैं, वैसे ही ज्ञान की धाराएँ आपको शक्ति और तेज से भर रही हैं।
Kanda 20 · Verse 1
सुरूपकृणुतमयै सुदुघामिव गोदुहे । जुहूमसि धविद्विष ॥ १ ॥
We offer this sacrifice, like a cow yielding abundant milk, to the one who adorns with beauty and dispels hatred.
हे सुंदर रूप वाली, जैसे गाय दूध देती है, वैसे ही तुम हमें धन-संपत्ति प्रदान करो। हम तुम्हारी पूजा करते हैं।
Kanda 20 · Verse 1
श्रायन्तइव सूर्य विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जाते जनमान् ओजसा प्रति भार्गं न दीधिम ॥ १ ॥
Just as the rays of light share and diffuse the radiance of the sun, so you too share and reflect the golden glories of Indra, the cosmic soul. Let us meditate on the divine presence and for our share enjoy the ecstasy of bliss vibrating in the world of past and future creation by virtue of Indra's omnipresent majesty.
सूर्य जैसे सभी देवता इंद्र के लिए ही भोजन करते हैं, मानो वे इंद्र को ही तृप्त कर रहे हों। जन्म लेते ही इंद्र अपनी शक्ति से धन-संपत्ति को ऐसे धारण करते हैं, जैसे कोई प्रकाश को धारण करता है।
Kanda 20 · Verse 1
Endra no gadhi priyaḥ satrājīdagohyaḥ. Girirna viśvataspr̥thuḥ patirdīvaḥ.
Indra, come, take us over as your own. Dear and giver of fulfilment you are, all dominant by nature, character and action, inconceivably open and bright, expansive and unbounded all round like a cloud of vapour, lord and master of the light of heaven.
हे इंद्र, तुम हमारे प्रिय मित्र हो, सत्य को छिपाने वाले नहीं। तुम पर्वत के समान विशाल और प्रकाशमान हो, जैसे सूर्य।
Kanda 20 · Verse 1
एतो न्विन्द्रं स्तवाम सखायं स्तोम्यं नरम् । कृष्टीयाँ विश्वा अभ्यस्तयेक इत् ॥ १ ॥
Come friends all together and let us adore Indra, lord and leader worthy of joint worship and exaltation, who, by himself alone, rules over all peoples of the world.
हे मित्रो, हम इंद्र की स्तुति करें, जो स्तुति के योग्य और शक्तिशाली हैं। वे अकेले ही सभी मनुष्यों के लिए कल्याणकारी हैं।
Kanda 20 · Verse 1
तुभ्येदिमां सर्वना शूर विश्वां तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धनां कृणोमि । त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधायसि ॥ १ ॥
हे शूरवीर! मैं तुम्हें यह सारी, विश्व को बढ़ाने वाली, सब प्रकार की सामर्थ्य प्रदान करता हूँ। तुम मनुष्यों द्वारा पूजनीय हो और समस्त विश्व का भरण-पोषण करने वाले हो।
Kanda 20 · Verse 1
वने न वा यो न्यधायि चाकँ छुचिर्वा स्तोमो भुरणावजीगः । यस्येदिन्द्रः पुरूदिनेषु होता नृणां नर्यो नृतमः क्षपावान् ॥ १ ॥
Vane na vā yo nyadhāyi cakaṁ chucirvām stomo bhuraṇāvajīgaḥ. Yasyedindraḥ purudineṣu hotā nṛṇāṁ naryo nṛtamaḥ kṣapāvān.
वन में या जहाँ भी स्थापित किया गया हो, जो पवित्र स्तोत्रों से युक्त है, वह इन्द्र सभी मनुष्यों में सबसे महान, सबसे शक्तिशाली और रात में भी जागृत रहने वाला है।
Kanda 20 · Verse 1
समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः । समुद्रायेव सिन्धवः ॥ १ ॥
सभी मनुष्य, सभी राष्ट्र, जैसे नदियाँ समुद्र की ओर बहती हैं, उसी प्रकार आपके प्रति नतमस्तक हों। यह श्लोक ईश्वर की सर्वव्यापकता और सभी के द्वारा उसकी आराधना का भाव व्यक्त करता है।
Kanda 20 · Verse 1
इन्द्राय मङ्कने सुतं परि ष्ठोभन्तु नो गिरः । अर्कमर्चन्तु कारवः ॥ १ ॥
Indrāya madvane sutam pari ṣṭobhantu no giraḥ. Arkamarcantu kāravaḥ.
हे इन्द्र देव, आपकी स्तुति में हमारे गीत गूंजें और विद्वान आपकी महिमा का गान करें।
Kanda 20 · Verse 1
यद्द्घ कच्चं वृत्रहृदगां अभ्ि सूर्य । सर्वं तदिन्द्र ते वशं ॥ १ ॥
O sun, dispeller of darkness, whatever the aim and purpose for which you rise today, let that be, O Indra, lord ruler of the world, under your command and control.
हे वृत्रहंता इंद्र! जो कुछ भी कच्चा, अपरिपक्व या छिपा हुआ है, वह सब आपके वश में है। आप ही सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान हैं।
Kanda 20 · Verse 1
अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जणुषां सुनादसि । युधेदापित्वमिच्छसे ॥ १ ॥
O Indra, you are without rivals and without enemies, and you are the source of joyous sounds. You desire victory in battle.
हे इन्द्र, तुम भाई-बंधुओं से रहित होकर भी, जन्म से ही महान नाद करने वाले हो। युद्ध में भी तुम विजय की इच्छा रखते हो।
Kanda 20 · Verse 1
मा भूम निष्ठांइवेन्द्र त्वदरणाऽइव । वनानि न प्रजाहिता-न्यद्रिवो दुरोऽसां अमनमहि ॥ १ ॥
Indra, lord almighty, maker and breaker of clouds and mountains, free from anger and fear we adore you and pray: Give us the grace that we may never be like the lowest of human species with nothing to be proud of, let us never be like the indifferent and the depressed, let us never be reduced to the state of forsaken thickets of dead wood.
हे इंद्र, तुम्हारी शक्ति के समान ही हमारी निष्ठा भी कभी कम न हो। हम वन और पर्वतों को भी तुम्हारे आगे नतमस्तक मानते हैं।
Kanda 20 · Verse 1
शग्ध्युईषु शचीपतेन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । भगं न हि त्वा यशसं वसुविदमन् शूर चरामसि ॥ १ ॥
Indra, lord of omnipotent action and infinitely various victories, with all powers, protections and inspirations, strengthen and energise us for excellent works without delay. As you are the very honour, splendour and treasure-home of the universe, O potent
हे इन्द्र, हम तुम्हारी यशोगाथाओं और धन-संपदा से युक्त शक्ति का गान करते हैं, क्योंकि तुम्हारे समान वीर और रक्षक कोई नहीं है।
Kanda 20 · Verse 1
अस्तावि मन्म॑ पूर्व्यं ब्रह्मेन्द्राय वोचत् । पूर्वीरृतस्य बृहतीरिनृषत् स्तोतुर्मेधा असृक्षत ॥ १ ॥
Eternal and adorable song of divine praise has been presented. Chant that for Indra, the divine soul. Sing the grand old hymns of divine law and glorify the Lord. Inspire and augment the mind and soul of the celebrant.
यह श्लोक कहता है कि प्राचीन काल में, ब्रह्मा ने इंद्र को यह महान ज्ञान दिया था। उस ज्ञान से प्रेरित होकर, स्तुति करने वाले की बुद्धि ने ऋत (सत्य) के विशाल और शक्तिशाली स्तोत्रों की रचना की।
Kanda 20 · Verse 1
वि हि सोतोर्ऋक्षत नेन्द्रं देवममंसत । यत्त्रा मदद् वृषाकपि- र्-यः पुष्टेषु मत्स्खा विश्वास्मादिन्द्र उत्तरः ॥१॥
Vi hi sotorasṛkṣata nendraṁ devamamamsata. Yatramadad vṛṣākapiryaḥ puṣṭeṣu matṣakhā viśvasmādindrattaraḥ ॥१॥
यह श्लोक बताता है कि जब इंद्र देव ने वृषाकपि नामक राक्षस को पराजित किया, तो देवताओं ने इंद्र को सबसे श्रेष्ठ माना। इंद्र की शक्ति और विजय ने उन्हें सभी से ऊपर स्थापित किया।
Kanda 20 · Verse 1
को अर्य बहुलिमा इष्ुनि ॥ १ ॥
Who shoots the many arrows of the world at you, O man?
यह श्लोक कहता है कि कौन सा व्यक्ति सत्य की राह पर चलने वाला है, जो सभी को प्रिय है और जो अपने कर्मों से दूसरों का कल्याण करता है। ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में महान और पूजनीय होता है।
Kanda 20 · Verse 1
आमिन्नोन्निति भद्यते॥ १॥
Āminoniti bhadyate.
यह श्लोक अधूरा है, इसलिए इसका सटीक अनुवाद संभव नहीं है। यदि श्लोक का अर्थ "आमिन्नोन्नति" (जो कि संभवतः "अवनति" का विपरीतार्थक है, अर्थात उन्नति) से संबंधित है, तो इसका संभावित अनुवाद यह हो सकता है: "उन्नति प्राप्त होती है।"
Kanda 20 · Verse 2
आ त्वां ब्रह्मयुजा हरिं वhastaमिन्द्र केशिना । उप्रं ब्रह्माणि नः शृणु ॥ २ ॥
यह श्लोक इंद्र की शक्ति और विजय का वर्णन करता है। इंद्र, जिनकी गर्दन मोटी, पेट भरा हुआ और भुजाएँ बलवान हैं, वे अपनी शक्ति से सभी बाधाओं को नष्ट कर देते हैं। वे शत्रुओं का संहार करते हैं और विजय प्राप्त करते हैं।
Kanda 20 · Verse 2
कणवाइव भृगवः सूर्याइव विश्वमृद्धीमानशुः । इन्द्रं स्तोमैर्भिर्मह्यह्यन्तं आयवः प्रियमैधासो अस्वरन् ॥ २ ॥
Like grains of barley, the Bhrigus, and like the sun, the world-enriching Angirasas, sang praises to Indra, the mighty, the beloved.
यह श्लोक कहता है कि जैसे कण (छोटे कण) भृगु (एक प्रकार के ऋषि) के समान हैं और सूर्य के समान विश्व को समृद्ध करने वाले प्रकाशमान अंशु (किरणें) हैं, उसी प्रकार स्तुतियों से युक्त होकर, आयव (एक प्रकार के ऋषि) इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गाते हैं।
Kanda 20 · Verse 2
शिक्षेयमस्मै दि lastly शचीपते मनीषिणे । यदहं गोपतिः स्याम्॥ २ ॥
यह श्लोक कहता है कि हे इंद्र (शचीपते), इस बुद्धिमान व्यक्ति को यह शिक्षा मिले कि मैं (अर्थात् वह व्यक्ति) पशुओं का स्वामी (गोपति) बनूँ। यह धन-संपत्ति और ऐश्वर्य की अभिलाषा को दर्शाता है।
Kanda 20 · Verse 2
अग्ं कामाय हृयो दध्वन्विरे स्थिराय हिन्वन्-हर्यो हरी तुरा । अवर्द्धिद्वयां हरिभ Jioषमीयते सो अस्य कामं हरिर्वन्त- मानशे ॥ २ ॥
The swift, bright steeds of desire have been yoked for the stable one, propelling him forward. Through these radiant horses, he attains his heart's desire, empowered by their brilliance.
यह श्लोक बताता है कि इच्छाओं को पूरा करने के लिए, मन को स्थिर और शक्तिशाली बनाना चाहिए, जिससे वह ईश्वर की ओर उन्मुख हो सके। जब मन ईश्वर में लीन हो जाता है, तो वह सभी इच्छाओं को पूर्ण करने में सक्षम हो जाता है।
Kanda 20 · Verse 2
स नः पप्रिः पारयाति स्वस्ति ना वा पुरुहूतः । इन्द्रो विश्वा अति द्विषः ॥ २ ॥
Sa naḥ papriḥ pārayāti svasti nāvā puruhūtaḥ. Indro viśvā ati dviṣaḥ.
यह श्लोक कहता है कि हे इंद्र! आप ही हमें पार लगा सकते हैं और कल्याणकारी हैं। आप ही सभी शत्रुओं का नाश करने में समर्थ हैं।
Kanda 20 · Verse 2
ता अर्बन्ति शुभ्र्यः पृञ्चन्तीवर्चसा प्रियः । ज्ञातं जातोयर्था हृदा ॥ २ ॥
They, radiant and pure, pour forth beloved radiance, illuminating the known and the yet-to-be-known within the heart.
यह श्लोक बताता है कि वे उज्ज्वल, प्रिय वस्तुएँ जो प्रकाश से परिपूर्ण हैं, हृदय से जानी जाती हैं। वे वस्तुएँ जो ज्ञान और सत्य से ओत-प्रोत हैं, वही वास्तव में पहचानी जाती हैं।
Kanda 20 · Verse 2
उपं नः सवनां गहि सोमस्य सोमपाः पिब । गोदा इन्द्रवतो मदः ॥ २ ॥
O Soma-drinker, come to our libations and drink the Soma. May this intoxicating draught, O Indra, bestow upon us cows.
हे सोमपान करने वाले इन्द्र, हमारे यज्ञ में आकर सोम का पान करो। यह सोम हमें गौएँ और बल प्रदान करने वाला है।
Kanda 20 · Verse 2
अनर्क्षरातिं वसुदामुपे स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य ऋतयः । सो अस्य कामं विद्धतो न रोषति मनो दानाय चोदयन ॥ २ ॥
Adore and meditate on Indra, giver of wealth, honour, excellence and bliss. Infinite is his generosity, unsatiating, auspicious his gifts. He does not displease the devotee, does not hurt his desire and prayer, he inspires his mind for the reception of divine gifts.
हे धन देने वाले इन्द्र की स्तुति करो, क्योंकि वे ही कल्याणकारी हैं और सत्य के मार्ग पर चलते हैं। वे प्रसन्नचित्त होकर दान देने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे वे क्रोधित नहीं होते।
Kanda 20 · Verse 2
Abhi hi satya somapā ubhe babhūtha rodasī. Indrāsī sunvato vr̥dhaḥ patirdīvaḥ.
Lord eternal and ever true, lover, protector and promoter of the beauty and joy of existence, you are higher and greater than both heaven and earth. Indra, omniponent lord and master of the light of heaven, you are the inspirer and giver of advancement to the pursuer of the knowledge, beauty and power of the soma reality
हे सोमपान करने वाले, तुम अभी ही सत्य और दोनों लोकों के स्वामी बन गए हो। हे इंद्र, तुम यज्ञ करने वालों के महान रक्षक हो।
Kanda 20 · Verse 2
अगौरुधाय गविषे द्युक्षाय दस्म्यं वचः । घृतास्वाद्यो मधुनाश्च वोचत ॥ २ ॥
Sing delightful songs of adoration in words more delicious than the taste of ghrta and sweetness of honey in honour of Indra, heavenly lord of light, who loves sweet speech and never feels satiated with songs of
हे गौओं की इच्छा करने वाले, प्रकाशमान और सुंदर! आपके लिए घी और मधु जैसे स्वादिष्ट वचन कहे जाते हैं। यह वाणी आपके लिए ही है, जो अत्यंत प्रिय और कल्याणकारी है।
Kanda 20 · Verse 2
नू चिन्नु ते मन्यमानस्य दस्मोदश्नुवन्ति महिमानमुग्र । न वीर्यं [मिन्द्र ते न राधः ॥ २ ॥
Nū cinnu te manyamānasya dasmodaśnuvanti mahimānamugra. Na vīrya mīndra te na rādhah.
हे इंद्र, जो मनुष्य अभिमान से युक्त होकर तुम्हें तुच्छ समझता है, वह तुम्हारी महानता, शक्ति और उदारता को कभी नहीं जान पाता।
Kanda 20 · Verse 2
ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत्समवर्त्तयत् । इन्द्रश्चर्मैव रोदसी ॥ २ ॥
यह श्लोक बताता है कि वह तेज (ओज) जो इन दोनों (द्युलोक और पृथ्वी) को एक साथ धारण करता है, वही इंद्र का बल है, जैसे चमड़ा शरीर को ढकता है। यह इंद्र की शक्ति का वर्णन करता है जो संपूर्ण ब्रह्मांड को एक साथ बांधे रखती है।
Kanda 20 · Verse 2
यस्मिन्विश्र्वा अधि श्रियो रणन्ति ससंसदः । इन्द्रं सुते हवामहे ॥ २ ॥
जिसमें ऐश्वर्य और शोभा युक्त सभाएँ शोभायमान होती हैं, उस इन्द्र को हम सोम रस के साथ आह्वान करते हैं।
Kanda 20 · Verse 2
यद्धां प्रवृद्ध सतपते न म्ं इति मन्यसे । उतो तत्सत्यमितत्वं ॥ २ ॥
If you think that even a little bit of effort in spiritual practice is not enough, then that very thought is the ultimate truth.
यह श्लोक कहता है कि यदि तुम यह मानते हो कि तुम्हारा मन बहुत अधिक तपस्या कर रहा है, तो समझ लो कि वही सत्य है। यह मन की शक्ति और उसकी अपनी धारणाओं के महत्व को दर्शाता है।
Kanda 20 · Verse 2
अमन-महिदनाऽशवो नुग्रासश्च वृत्रहन् । सकृत्सु ते महता शूर राधसानु स्तोमं मुदीमहि ॥ २ ॥
Amanmahidanaśavo nugrāsāśca vṛtrahan. Sakṛtsu te mahatā śūra rādhasānu stomam mudīmahi.
हे वृत्रहन् (इंद्र), आपकी महान कृपा से हम सब मिलकर एक साथ आपकी स्तुति करते हैं। आपकी शक्ति और उदारता से हम आनंदित होते हैं।
यह श्लोक कहता है कि तीव्र गति वाले, मधुर और घी से युक्त सूर्य की स्तुति करो। हमें धन, शक्ति और सोम रस प्राप्त हो।
Kanda 20 · Verse 2
को असिद्याः पर्यः ॥ २ ॥
Who brings you the fruit of uncontrolled acts of mental darkness?
यह श्लोक अत्यंत संक्षिप्त है और इसका अर्थ संदर्भ पर निर्भर करता है। यदि यह किसी बड़े पाठ का अंश है, तो उसका अर्थ स्पष्ट हो सकता है। बिना संदर्भ के, इसका एक संभावित सरल हिंदी अनुवाद यह हो सकता है: "तुम कौन हो, हे असीमित शक्ति वाले?" या "हे असीमित, तुम कौन हो?"
Kanda 20 · Verse 2
तस्य अनु निभञ्जनम्॥ २॥
Tasya anu nibhañjanam.
उसका अनुकरण करना या उसका अनुसरण करना ही उसका खंडन है। यह श्लोक किसी वस्तु या विचार के वास्तविक स्वरूप को समझने और उसे स्वीकार करने की बात करता है।
Kanda 20 · Verse 3
धेनुष्टे इन्द्र सूत यजमानाय सुन्वते । गामश्वं पिप्युषी दुहे ॥ ३ ॥
हे इंद्र! यज्ञ करने वाले यजमान के लिए, जो सोम रस निकाल रहा है, आप गाय और घोड़े को पुष्ट करने वाली गौ का दूध दुहें।
Kanda 20 · Verse 3
अथां ते अन्तमानां विद्यामं सुमतीनाम् । मा नो अति ख्य आ गहि ॥ ३ ॥
May we know the end of our sorrows, O bestower of good thoughts. Do not pass us by.
हे ईश्वर, हम आपकी कृपा और उत्तम बुद्धि की कामना करते हैं। कृपया हमें अपने मार्ग से विचलित न करें और हमारे पास आएं।
Kanda 20 · Verse 3
वणमहाँ असि सूर्य बडादित्य महॉ असि । महस्ते सतो महिमा पनसयतेद्वा देव महाँ असि ॥ ३ ॥
Vanmahan asī sūrya baḍāditya mahān asi. Mahaste sato mahimā panasyate'ddhā deva mahān asi.
हे सूर्य देव, आप महान हैं, आप आदित्य हैं, आप महान हैं। आपकी महानता और महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता, आप वास्तव में महान हैं।
Kanda 20 · Verse 3
वि चिद् वृत्रस्य दोधतो वज्रेण शतपर्वणा । शिरो बिभेद वृष्णिना ॥ ३ ॥
Vi cid vṛtrasya dodhato vajreṇa śataparvaṇā. Śiro bibheda vṛṣṇinā.
यह श्लोक इंद्र द्वारा वृत्र नामक असुर का वध करने का वर्णन करता है। इंद्र ने अपने वज्र नामक शक्तिशाली शस्त्र से वृत्र का सिर काट दिया।
Kanda 20 · Verse 3
को अर्जुन्द्याः पर्यः ॥ ३ ॥
Who brings you the fruit of enlightened eats of the mind?
यह श्लोक अत्यंत संक्षिप्त है और इसका सीधा अर्थ निकालना कठिन है। संभवतः यह किसी बड़े श्लोक का अंश है या इसमें कोई विशेष संदर्भ है जो यहाँ उपलब्ध नहीं है। यदि इसका शाब्दिक अर्थ निकालने का प्रयास करें, तो यह कुछ इस प्रकार हो सकता है: "अर्जुन के लिए क्या है?" या "अर्जुन के लिए कौन है?" यह प्रश्न किसी परिस्थिति में अर्जुन की स्थिति या उसके लिए किसी सहायता के बारे में हो सकता है। इसका आध्यात्मिक भाव संदर्भ के बिना स्पष्ट नहीं हो पाता।
Kanda 20 · Verse 3
वरुणो याति वस्वभिः॥ ३॥
Varuṇo yāti vasvabhiḥ.
यह श्लोक वरुण देव के बारे में है, जो जल और वर्षा के देवता हैं। वे अपने साथ धन-संपत्ति और ऐश्वर्य लेकर आते हैं।
Kanda 20 · Verse 4
कः काष्र्ण्याः पर्यः ॥ ४ ॥
Who brings you the fruit of attractive but blurred activities of mind?
यह श्लोक एक प्रश्न पूछता है कि अंधकार का अंत क्या है। इसका अर्थ है कि अज्ञान या दुख का निवारण कैसे संभव है।
Kanda 20 · Verse 4
शतं वा भारती शवः॥ ४॥
Śataṁ vā bhāratī śavaḥ.
यह श्लोक कहता है कि एक सौ (शतं) बार भी यदि कोई व्यक्ति केवल वाणी (भारती) से ही कुछ कहे, तो वह व्यर्थ है, क्योंकि कर्म के बिना केवल शब्द शव (मृत शरीर) के समान निष्प्राण होते हैं।
Kanda 20 · Verse 5
एतं पृच्छं कुहं पृच्छ ॥ ५ ॥
Ask this one, ask that one.
यह श्लोक एक प्रश्न पूछता है कि "किसे पूछें, कहाँ पूछें?" यह आत्म-अन्वेषण और सत्य की खोज की ओर संकेत करता है।
To the supremely great, the vast, the Truth-powered, the mighty, the divine form is offered. His strength is in the waters, His glory is all-pervading, and His power is unhindered.
हे महान, विशाल, सत्य-शक्तिशाली ईश्वर, मैं आपकी मूर्ति धारण करता हूँ। आपकी शक्ति से, जो सभी को जीवन देती है, मैं जल के प्रवाह में भी अजेय हूँ।
Kanda 20 · Verse 17
अच्छाम इन्द्रं मतयः स्वर्विदः । सधीचीर्विश्व उशतीरनुव्रत । परि ष्यजन्तं जनयो यथा पतिं मर्त्यं न शुन्ध्युं मघ- वानमूताये ॥ ९ ॥
The wise, seeking heaven, praise the mighty Indra, and all women, eager, follow him like a wife her husband, the powerful, pure, and generous one.
यह श्लोक इंद्र देव की स्तुति करता है, जो ज्ञान और धन से परिपूर्ण हैं। बुद्धिमान लोग, जो स्वर्ग का मार्ग जानते हैं, उन्हें अपनी इच्छाओं से उसी प्रकार घेर लेते हैं जैसे पत्नियाँ अपने पति को घेरती हैं। वे इंद्र को यज्ञों और अनुष्ठानों द्वारा प्रसन्न करते हैं।
Kanda 20 · Verse 48
कण्डिका २०/सूक्त ४८
The divine light of the Sun illuminates all beings, dispelling darkness and bestowing life and prosperity.
यह श्लोक बताता है कि ईश्वर की कृपा से ही हम सत्य का अनुभव कर सकते हैं और अज्ञानता के अंधकार से बाहर निकल सकते हैं। वह हमें ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं, जिससे हमारा कल्याण होता है।
Kanda 20 · Verse 54
विश्वाः पृत्ना अभितभृतरं नरं सजूस्ताकषुरिन्द्रं जजनुश्च राजसे । कृत्वा वरिष्ठां वर आमुरीमुतग्रामोजिष्ठं तवसं तारस्विनम् ॥ १ ॥
The world's battles have been conquered by the mighty Indra, who was born to rule, bestowing supreme boons and invincible strength.
यह श्लोक बताता है कि सभी युद्धों में विजयी होने वाले, सभी को धारण करने वाले, और सभी के साथ रहने वाले इंद्र को देवताओं ने उत्पन्न किया। उन्होंने इंद्र को श्रेष्ठ, शक्तिशाली और विजयी बनाया।
Kanda 20 · Verse 64
एन्द्रं नो गधि प्रियः संत्राजिगोह्यः । गिर्निं विश्वतस्पृथुः पतिर्दिवः ॥ १ ॥
May the beloved Indra, the protector, be our friend, the lord of the sky, who is all-pervading and encompasses all.
यह श्लोक इंद्र से संबंधित है, जो देवों के राजा हैं। यह उनकी शक्ति और व्यापकता का वर्णन करता है, जो सभी दिशाओं में फैली हुई है। वह स्वर्ग के स्वामी हैं और सभी के प्रिय हैं।
Kanda 20 · Verse 64
अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी । इन्द्रासि सुन्वतं वृधः पतिर्दिवः ॥ २ ॥
You have become both heaven and earth, O Soma-drinker, and the increaser of the worshipper. You are Indra, the lord of the sky.
हे सत्य के रक्षक इंद्र! तुम ही सूर्य और पृथ्वी दोनों हो। तुम यज्ञ करने वालों के बढ़ाने वाले और स्वर्ग के स्वामी हो।
Kanda 20 · Verse 69
Sa ghā no yoga ā bhuvatsa rāye sa puraṁdhyām. Gamadvaṁjebhira sa naḥ.
Indra, life and energy of the universe, is at the heart of our meditation. That is the spirit and secret of the wealth of the world. That is the inspiration at the centre of our thought and intelligence. May that lord of life and energy come and bless us with gifts of knowledge and power in our joint endevours.
यह श्लोक प्रार्थना करता है कि योग (ईश्वर से जुड़ने का मार्ग) हमें धन, समृद्धि और संतान प्रदान करे, और हमें विजय दिलाए। यह ईश्वर से कृपा और सहायता की याचना है।
Kanda 20 · Verse 70
वीडु चिदारुजतुर्भिर्गुहां चिदिन्द्रं वह्निभिः । अविन्द उस्त्रिया अनु ॥ १ ॥
The mighty sun with its piercing rays breaks down things in the sky, and the wind with its currents after the sunbeams reconstructs and replaces new forms of things in the sky.
यह श्लोक बताता है कि कैसे ज्ञान की अग्नि से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और सत्य का प्रकाश प्रकट होता है। जैसे सूर्य की किरणें अंधकार को चीरकर प्रकाश लाती हैं, वैसे ही आत्मज्ञान से आत्मा का सत्य स्वरूप प्रकाशित होता है।
Kanda 20 · Verse 72
विश्वेषु हि त्वा सवनेषु तुञ्जते समानमेकं वृष्मण्यवः पृथक्वस् । सन्निवृभ्यः पृथक् । तं त्वा नावं न पर्षणं शुष्पस्य धुरि धीमहि । इन्द्रं न यज्ञैश्चितयन्त आयव स्तोमैभिरि- न्द्रमायवः ॥ १ ॥
We place you, O Indra, like a strong chariot, at the forefront of our sacrifices and praises, for you alone are the sustainer of all worlds.
यह श्लोक इंद्र देव की स्तुति करता है, जो सभी लोकों में यज्ञों और स्तुतियों से प्रसन्न होते हैं। हम उन्हें अपनी शक्ति और सामर्थ्य के शिखर पर स्थापित करते हैं, जैसे नाव को सहारा दिया जाता है। इंद्र देव यज्ञों और स्तुतियों से पूजित होते हैं।
O Indra, the desiring ones, united in pairs, have poured forth the cattle from the enclosure. They have revealed the powerful, jointly moving one.
हे इन्द्र! जो कामुक और कामनाओं से युक्त मनुष्य, गायों के समूह और गोशाला की रक्षा के लिए तुम्हें पुकारते हैं, वे तुम्हें प्राप्त करते हैं। जब दो व्यक्ति मिलकर किसी वस्तु को प्रकट करते हैं, तो वह वस्तु स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
Kanda 20 · Verse 93
उत्त्वा मन्दन्तु स्तोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः । अवं ब्रह्मद्विषो जहि ॥ १ ॥
Indra, Lord Almighty, commander, controller
हे इंद्र, स्तुतियों को मंद करो और धन प्रदान करो। हे वज्रधारी, ब्रह्मद्वेषी को मार डालो।
Kanda 20 · Verse 128
यः सुभैयो विदथ्यः । सुत्वा यज्याथ पुरुषः । सूर्यम् चामू रिषादसदद्देवाः प्रागकल्पयन् ॥ १ ॥
यह श्लोक बताता है कि जो व्यक्ति यज्ञ करता है और सूर्य की उपासना करता है, वह देवताओं द्वारा स्वीकार किया जाता है और उसे उत्तम फल प्राप्त होते हैं। यह कर्म और भक्ति के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दर्शाता है।
Kanda 20 · Verse 135
भुगित्यभिगतः शलित्युपक्रान्तः फलिष्यभिष्टितः । दुन्दुभिंमाहननाभ्यां जरितरोथामो दैव ॥ १ ॥
Having been touched by the desire for enjoyment, and having begun the pursuit of its fruits, the soul, struck by the drumbeats of fate, is lifted up.
यह श्लोक बताता है कि जब कोई व्यक्ति अपने कर्मों के फल का अनुभव करने लगता है और उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, तो वह भाग्य को दोष देने लगता है। यह जीवन की उन परिस्थितियों का वर्णन करता है जहाँ व्यक्ति अपने कर्मों के परिणाम भुगतता है और फिर उसे लगता है कि यह सब भाग्य का खेल है।
Kanda 20 · Verse 138
महाँ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्ययो वृष्टिमाँ-इव । स्तोमैरวัตसस्य वावृधे ।। १ ।। Mahān indro ya ojasā parjanyo vṛṣṭimān-iva Stomairvatsasya vāvṛdhe.
Great is Indra by his power and splendour like the cloud charged with rain and waxes with pleasure in the dear devotee's awareness by his child like hymns of adoration.
यह श्लोक इंद्र की महानता का वर्णन करता है, जो अपनी शक्ति से वर्षा करने वाले मेघ के समान हैं। स्तुतियों के माध्यम से उनकी शक्ति और वृद्धि होती है।